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सांस्कृतिक धरोहर

                                                     शिवरात्री मेले का संक्षिप्त इतिहास व सांस्कृतिक महत्व

विश्व के सांस्कृतिक इतिहास में हिमालय क्षेत्र का महत्वपूर्ण स्थान है। इस क्षेत्र की सांस्कृतिक, धार्मिक व सामाजिक गतिविधियां, पर्व, त्योहार, मेले तथा लोकजीवन हिमालयाधिपति शिव की भक्ति से परिपूर्ण है। यहां शैव परम्परा का निर्वाह लोकजीवन का अभिन्न अंग है। इस परम्परा में वर्ष भर अनेक मेले, पर्व त्योहार तथा धार्मिक अनुष्ठान अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाए जाते हैं। कर्मकाण्ड सबन्धी देव परम्परा के संरक्षण व धार्मिक अनुष्ठानों में मण्डी नगर का विशेष ऐतिहासिक, धार्मिक, सांसकृतिक तथा पुरातात्विक महत्व रहा है जिससे यह नगर ‘छोटी काशी’ के नाम से विख्यात है। हिमाचल प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में जहां शिवरात्री अत्यन्त श्रद्धा से मनाया जाता है वहीं मण्डी के मेले को अन्तर्राष्ट्रीय मेले के रूप में मनाया जाता है।

मण्डी की राजधानी सन 1526 ई. तक पुरानी मण्डी में ही थी। और आज जिस स्थान पर घनी आबादी है उस स्थान पर घनघोर जंगल था। लोक मान्यता के अनुसार उस समय के राजा अजबर सेन को आश्चर्यचकित करने वाला स्वपन दिखा जिसमें शिव की पिण्डी पर एक गाय दूध चढ़ा रही थी। जिस कारण सन 1526 में उसी स्थान पर भूतनाथ का मन्दिर बनवाया गया और राजधानी भी बदल दी गई। उसी समय से मण्डी नगर में शिवरात्री मेलों का आयोजन भी होने लगा। मण्डी में भगवान विष्णु के अवतार भगवान राजमाधव जी की स्थापना सन 1648 ई. में राजा सूरजसेन ने की थी। राजा सूरजसेन ने अपनी कोई सन्तान न होने के कारण अपनी रियासत श्री राजमाधव को अर्पित कर दी। तभी से मण्डी के सभी राजा भगवान राजमाधव के नाम से ही राज करते आए हैं।

शिवरात्री पर्व के अवसर पर आए सभी देवी देवताओं को लेकर श्री राजमाधव सबसे पहले मण्डी नगर के इष्ट देव श्री भूतनाथ जी को पुरातन संस्कृति की मनोरम झांकी प्रस्तुत करते हुए श्रद्धासुमन अर्पित करने आते हैं। इस मेले में हिमाचल प्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा प्रदर्शनियों के माध्यम से प्रदेश के चहुंमुखी विकास की प्रस्तुति की जाती है। स्थानीय कलाकार व बच्चे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों को चार चांद लगा देते हैं। प्रदेश तथा देश के अन्य भागों से आए कलाकार, साहित्यकार अपने सांस्कृतिक व साहित्यिक प्रस्तुतियों से ‘अनेकता में एकता ‘ का प्रदर्शन करते हैं। विदेशों से आए सांस्कृतिक दल इस मेले को अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान व ख्याति प्रदान करके इस मेले की गरिमा बढ़ा देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से आए भक्त पहाड़ी वाद्ययन्त्रों की धुन में अपने देवी देवताओं की पालकियां अपने कन्धों पर लिए हुए जब मण्डी नगर में प्रवेश करते हैं तो वातावरण झूम उठता है। इस बात में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि यह पहाड़ी परम्परा व अछूती संस्कृति देखने वालों पर अपनी अमिट छाप छोड़ती है।

शिवरात्री मेला परम्परागत लोक कला एवं संस्कृति का प्रतीक है। सदियों से इस मेले का प्रारूप व्यापारिक व सांस्कृतिक ही था। परन्तु जैसै जैसै समाज ने करवट बदली इसने आधुनिकता को भी सरलता से अपने में समेट लिया। वर्तमान में इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों, खेलों व अन्य मनोरंजनों को भी जोड़ दिया गया है। जिससे आधुनिक युग की उपलब्धियों की झलक भी देखने को मिलती है। वर्तमान में श्रद्धा और विश्वास, मानव और देवता के मिलन का ऐसा मनोरम दृष्य शायद ही कहीं और देखने को मिलता होगा जैसा कि शिवरात्री के पावन अवसर पर मण्डी में देखने को मिलता है।