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मण्डी का इतिहास

मण्डी हिमाचल प्रदेश का एक प्रमुख शहर है, जिसे ‘ माधव नगर ‘ एवं ‘ सहोर ‘ के नाम से भी जाना जाता है। मण्डी नगर हिमाचल की राजधानी शिमला से 153 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर में स्थित है। मण्डी शहर का नाम महान ऋषि माण्डव के नाम पर रखा गया, जिन्होंने यहाँ आकर इतनी घोर तपस्या की, कि उनकी तपस्या की गंभीरता ने चट्टानों को काला कर दिया। मण्डी शहर अपने 81 शैव मंदिरों की प्राचीन एवं उत्तम नक्काशी के लिए प्रसिद्ध  है। इसी कारण से मण्डी को ‘ पहाड़ों की वाराणसी ‘ और ‘ छोटी कशी ‘ भी कहा जाता है।

जब तक 765 ईस्वी में सुकेत का गठन नहीं हुआ था उससे पहले मण्डी शहर के प्रारंभिक इतिहास के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। प्राचीन साहित्य में केवल रिवालसर का उल्लेख किया गया है, जिसे स्कन्द पूर्ण नामक एक पवित्र तीर्थस्थान कहा गया है। वर्तमान मण्डी जिले का निर्माण दो रियासतों, मण्डी राज्य एवं सुकेत राज्य के विलय से 15 अप्रैल 1948 में हुआ था जब हिमाचल प्रदेश को स्थापित किया गया था। जिले के गठन के बाद से इसके अधिकार क्षेत्र में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं देखा गया है। यह माना जाता है कि मण्डी और सुकेत के राजा दोनों ही चंद्रवंशी राजपूतों के वंशज थे जिनका दावा  है कि उनके पूर्वज महाभारत के पांडव रहे हैं। कहा जाता है की उनके पूर्वजों ने 1700 वर्षों तक इंद्रप्रस्थ पर राज किया, जब तक खेमराज को उसके वज़ीर, बिसर्प ने राजा की गद्दी से हटाकर खुद राज्य को संचालित नहीं किया। खेमराज अपने राज्य को खोकर बंगाल भाग गया, जहाँ उसके 13 उत्तराधिकारियों ने 350 वर्षों तक शासन किया। वहां से उन्हें पंजाब में रोपड़ के लिए पलायन करना पड़ा, लेकिन यहाँ भी राजा, रूप सेन, मारा गया और उसके पुत्रों में से एक, बीर सेन, पहाड़ियों के लिए भाग गया और सुकेत पहुंच गया। कहा जाता है कि सुकेत राज्य बंगाल की शिवसेना के राजवंश बीर सेन द्वारा स्थापित किया गया है।

मण्डी और सुकेत 1200 ईस्वी में एक दूसरे से अलग हो गए। उस समय तक सुकेत एकल राज्य था। उस समय राज प्रमुख साहू सेन का अपने छोटे भाई बाहू सेन के साथ झगड़ा हुआ और उसने अपनी किस्मत की तलाश कहीं और करने के लिए सुकेत छोड़ दिया। सुकेत छोड़ने के बाद बाहू सेन कुल्लू के मंगलं चला गया, जहाँ उसके वंशज 11 पीढ़ियों तक रहे। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री, क्रंचन सेन कुल्लू के राजा के साथ युद्ध में मारा गया और उसकी पत्नी जो उस समय गर्भवती थी अपने पिता के पास भाग गयी। वहां उसने एक बेटे को जन्म दिया जिसका नाम बान रखा गया। बान महज़ 15 साल का था जब उसने किलटी के राजा को हरा दिया। उसके बाद उसने स्कोर के राणा को मारकर उसकी भूमि अपने नाम कर ली। तब बान व्यास के किनारे आकर बस गया, जो वर्तमान के मण्डी शहर से कुछ मील की दुरी पर है।

सोलहवीं सदी की शुरुआत में मण्डी एक अलग राज्य के रूप में उभरा। बान का बेटा अजबर सेन, जो बाहू सेन का 19वां वंशज था, उसने 1527 ईस्वी में मंडी शहर की स्थापना की। अजबर सेन मंडी के प्रथम महान शासक था। वह राजा का पद ग्रहण करने वाला पहला शासक था। उसने विरासत में मिली रियासतों को और पड़ोसियों से उनकी रियासतें छीनकर अपनी रियासत में मिला दिया। उसने यहां एक महल बनाया और चार मीनारों के साथ उसे विभूषित किया। उसने भूतनाथ मंदिर का भी निर्माण किया और उसकी रानी ने त्रिलोकीनाथ मंदिर बनवाया। उनके वंशजों में से एक राजा सिद्ध सेन था जो राजा गुरसेन के बाद 1678 ईस्वी में आया। मंडी उनके शासनकाल से पहले इतना शक्तिशाली कभी नहीं था और उस के बाद भी कभी नहीं हुआ। उसने आसपास के क्षेत्रों में से महान क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। यह वह दौर था जब सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविन्द सिंह जी ने 17वीं सदी में मण्डी का भ्रमण किया।

गुरु गोविन्द सिंह जी को कुल्लू के राजा जिनसे उन्होंने मुगल सैनिकों के खिलाफ सहायता की मांग की थी, ने बंदी बना लिया था। उनके अनुयायियों का मानना है कि वहां से वे अपनी चमत्कारी शक्तियों के द्वारा बहार निकल कर आ गए थे। राजा सिद्ध सेन ने, जो खुद भी चमत्कारी शक्तियों का स्वामी था, गुरु जी का बहुत आदर सत्कार किया। उसने महल के साथ एक टैंक का निर्माण किया। उसने ‘ सिद्ध गणेश ‘ और ‘ त्रिलोकीनाथ ‘ मंदिर का भी निर्माण किया। मंडी और सुकेत दोनों राज्यों के इतिहास आपस और अन्य आसपास के राज्यों से युद्ध से भरे पड़े है। ये दोनों राज्य हमेशा ही दुश्मन रहे हैं, लेकिन उनके युद्ध का कोई महान परिणाम नहीं निकला। बल्ह की उपजाऊ घाटी इच्छा और विवाद की आम जमीन थी।

21 फ़रवरी 1846 को मंडी और सुकेत के राजा ब्रिटिश सरकार के लिए उनकी निष्ठा दिखाने और उनका संरक्षण हासिल करने के लिए श्री अर्स्काइन के पास गए जो पहाड़ी राज्यों के अधीक्षक थे। 9 मार्च, 1846 सिख दरबार एवं ब्रिटिश सरकार में एक संधि के बाद ब्यास और सतलुज के बीच दोआब के पूरे क्षेत्र को ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया गया, जिसमें सुकेत और मण्डी राज्य भी शामिल थे। 1 नवंबर 1921 को, मंडी और सुकेत राज्य को पंजाब सरकार के राजनीतिक नियंत्रण से हटाकर, भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त 1947 तक भारत सरकार में स्थानांतरित कर दिया गया।